Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 158, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 158, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 158 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
मुनिरुवाच ।
एतत्ते कथितं सर्वं भविष्यद्भूतवत्तव ।
यथेच्छसि तथेदानीं व्याध साधु विधीयताम् ॥ १ ॥
अग्निरुवाच ।
इति तस्य वचः श्रुत्वा विस्मयाकुलचेतनः ।
क्षीणं स्थित्वा जगामाशु स्नातुं व्याधस्तथा मुनिः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
एक सौ रूप्पनवाँ सर्गं समाप्त
एक सौ सत्तावनवाँ सर्ग
सिन्धु के तामसतामस जन्म का वर्णन तथा
विवेकवश राज्य का त्याग कर रहे सिन्धु की अन्त में मुक्ति का वर्णन ।
इसके पश्चात् सिन्धु कहेगा : हे आर्य, मै मन्दमति पूर्व जन्म में किस अनार्य योनि में पैदा हुआ था,
जिसके कारण मेरे पूर्वजन्म के कुसंस्कार ने मुझे संसारसागर में पटका ? मन्त्री कहेगा : हे राजन्,
क्षणभर सावधान चित्त होकर पूर्वजन्म का रहस्य सुनिए । आज मेरे द्वारा प्रेरित होकर अज्ञान का विनाश
करनेवाले मेरे वचन को आप हृदय में धारण करेगे