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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 158, Verses 20–22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 158, verses 20–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 158 · श्लोक 20-22

संस्कृत श्लोक

भूयः प्रजातानि वनानि भूमौ ग्रामाः कृताः पत्तनसंयुताश्च । पातालतः साधुसमुत्थितास्ते शैलाः प्रवृत्ता व्यवहारलक्ष्मीः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

पाँच दश जन्म के परवर्ती काल तक उस कल्प में विवेक आदि उत्तम गुणों से रहित जो जाति बहुत से जन्मों के बाद विवेक आदि उत्तम गुणों को प्राप्त करती हे, वह केवल राजसी जाति है | कल्पादि से लेकर अति प्रचुर स्थावर, कीट, पतंग आदि योनियों से अन्त मेँ मोक्षभागिनी हो तो जाति जाननेवाले सज्जन उस जाति को तामसतामसी कहते हैं । अनुत्कृष्ट (तुच्छ) राक्षस, पिशाच, शूद्र आदि अनेक जन्मों से यदि मोक्षभागिनी हो तो जातिविशारद उस जाति को केवल तामसी कहते हैं