Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 161, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 161 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
तदेवाकाशमात्रात्म यद्यविद्येति कथ्यते ।
तद्यदास्ते तदेवाहं बन्धः स्वकलनात्मकः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि इस समय यह जगत् भूतमय (भौतिक) है, ऐसा कहा जा सकता है तथापि सृष्टि के आदिकाल
में सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाउद्वितीयम्” (हे सौम्य, पहले यह एक अद्वितीय सत् ही था) इत्यादि
श्रुति से ब्रह्म से अतिरिक्त दूसरे किसी कारण की संभावना ही नहीं की जा सकती, अतः अकारण
जगत् को ब्रह्म से अतिरिक्त मानो तो वह अत्यन्त असत् है, यह कहते हैं।
सृष्टि के आदि काल में ही यह सृष्टि आदिकारण का अभाव होने से, कुछ भी नहीं था, अतः
यह जगत् किंमय हो