Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 162, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
चिद्व्योमार्थतयार्थानां यथास्थितमिदं जगत् ।
सरूपालोकमननमपि चिद्व्योम केवलम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानवश ही इसका भान होता है, ज्ञान होनेपर यह ब्रह्म ही है, यह वर्णन ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, मुनि और व्याध का भास द्वारा वर्णित सैकड़ों सुख-दु:खआदि
दशाओं से युक्त जो यह वृत्तान्त है यह क्या प्रतिदिन दिखाई दे रहे स्वप्न आदि के समान अन्य कारण
से शून्य है अथवा जैसे लवण, गाधि आदि के चाण्डालता आदि एेन्द्रजालिक तथा भगवान के वरदान
आदि निमित्त से हुए थे वैसे ही किसी अन्य निमित्त से हुआ है ?
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ साठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ इकसठवाँ सर्ग जगद्रूप चित्र का ब्रह्म से अतिरिक्त दूसरा कारण नहीं है यह चिन्मात्रप्रतिभारूप है।