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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verse 44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 162, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 44

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

एक सद्‌ वस्तु का ही सकल द्रैतरूप से (सर्गरूप से) जब प्रतिभास है तब ब्रह्म ही द्वैत-अद्वैत ओर अद्रिताभिन्न भी हे, उससे अतिरिक्त कुछ भी सिद्ध नहीं होता, यह भाव है