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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verses 9–14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 162, verses 9–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 9-14

संस्कृत श्लोक

चिद्रूपं यन्न किंचित्तदिदं किंचिदवस्थितम् । भाति दृश्यमिवादृश्यमपि स्वप्नपुरेष्विव ॥ ९ ॥ चिच्छायेयं प्रकचति जगदित्यभिशब्दिता । नन्वमूर्तैव मूर्तेव द्रव्यच्छायेव वै तता ॥ १० ॥ कायमात्रकमेवेदं भ्रान्तिमात्रमसन्मयम् । पिशाचविभ्रमालोकप्रायमायासनं दृढम् ॥ ११ ॥ मनोराज्यमिवासत्यं लोलं लम्बाम्बुबिन्दुवत् । द्वाभ्यामित्यनुभूतिभ्यां यदसत्तत्र कात्मता ॥ १२ ॥ विदार्यदारुरववत्तरङ्गानिलशब्दवत् । खे शब्दाः पवनस्फोटा भान्त्यर्था वासनोदयाः ॥ १३ ॥ सर्गादितः स्वपरिभा कचति स्वप्नशैलवत् । वस्तुतस्तु न शब्दोस्ति नार्थोऽस्ति न च दृश्यता ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे तत्त्वज्ञ लोगों, संसार चिदाकाश का विकासमात्र है, अत: सर्वतः (सब प्रकार से) सत्य शिव सुन्दर में आस्था, अनास्था आदि (आदर, निरादर आदि) क्या ? आप लोग यथास्थित स्वरूप का अवलम्बन कर स्थित रहें । जैसे सागर से तरंगे अपने आप उठती हैं, वैसे ही देदीप्यमान सच्चिदानन्द आत्मा से कार्यकारण दृष्टि से प्रतिभानात्मक स्वात्मभूत पदार्थ उदित होते हैं चिदाकाश का स्वसंकल्प-सा ओर स्वसृष्टि-सा जो अति विशाल प्रतिभान है उसीको उसने "जगत्‌" समझा है । ऐसी स्थिति में यर्हापर पृथिवी आदि कौन हैं और कहाँ से आये ? यह आभास ऐसे प्रतिभासित होता है और कुछ भी नहीं ही भासता है, ब्रह्ममे ही ब्रह्म स्थित हे । अविद्या नामधारी जगत्‌ का स्वतः भान होता है अन्य कारण से उसका भान नहीं होता । यहाँ चिद्घन से ही घनता है अन्य पृथिवी आदि से घनता (निविडता) नहीं है । सारा जगत्‌ चिदाकाश ही हे । यही परमबोध है, इसका भूमिका के अभ्यास से जो दृढ़ीकरण है वह मुक्ति है । शून्यता के (आकाशता के) रूप की (नीलता की) तरह स्थित अज्ञान का अवलम्बन कर भ्रम व्याप्त है । वास्तव में यह निराकार शान्त चिदाकाश ही जगत्‌ के रूप में भासित होता हे