Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 163, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 163 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । विनेन्द्रियजयेनेदं नाज्ञत्वमुपशाम्यति । तदिन्द्रियाणि जीयन्ते कथं कथय मे मुने ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

सकल दृश्य का चिदाकाश के लिए ही स्फुरण होता है, इसीलिए भी चिन्मात्र परिशेष है, ऐसा कहते हैं । सकल पदार्थ चिदाकाश के भोग के लिए हैं अतएव जैसे गाय आदि के उपभोग्य तृण आदि गाय आदिरूप से ही अवशिष्ट रहते हैं वैसे ही बाहरी रूप लोक और आभ्यन्तर मनन के साथ बाह्य और आभ्यन्तर यथास्थित यह जगत्‌ केवल चिदाकाशरूप से ही अवशिष्ट रहता है

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ इकसठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ बासठवाँ सर्ग समस्त द्वैत का ब्रह्ममात्रत्व वर्णन द्वारा अविद्या का निराकरण करना |