Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 164, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 32
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हिन्दी अर्थ
परमपद में आदि अन्त ओर मध्य की कोई
कल्पनाएँ नहीं हे । यह दृश्यरूपा अविद्या परमपदरूप ही है । अतः अविद्या नाम का पृथक् पदार्थ यहाँ
कोई नहीं है