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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 165, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 165, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 165 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

जाग्रतस्वप्नवता स्वप्नः स्वप्न इत्यभिधीयते । स्वप्नजाग्रद्वता जाग्रज्जाग्रदित्यभिधीयते ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

तो क्या अविद्या, अन्तःकरण, देह आदि से भेदावस्थाओं मे पहले जीव भिन्न ही थे, इस समय विद्या द्वारा ब्रह्मैक्य को प्राप्त किये गये ? इस शंकापर नकारात्मक उत्तर देते हैं। तत्त्वज्ञो का विषयभूत जो परम निर्मल ब्रह्म है वह तो इन सभी अवस्थाओं में भेद आदि मल से रहित एकरस ही है। उसमें कदापि किंचित्‌ भी द्वैतरूपी मलका अस्तित्व नहीं है