Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 166, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 166 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
कचनोक्त्या तु रहितां समग्रेणास्तकल्पनाम् ।
विनोत्तरपदार्थेन त्वात्मख्यातिमिमां विदुः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न भी जाग्रत् यहाँ जाग्रत् के जगत् की तरह अनुभव से जाग्रत्
ही हे स्वप्न कदापि नहीं है इसी प्रकार जाग्रतस्वरूप मनोराज्य में जाग्रत् अनुभवतः स्वप्न ही है नकि
जाग्रत्