Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
किंतु नास्त्येष बाह्योऽर्थो भूतानामत्यसंभवात् ।
पञ्चानामादिसर्गादौ कारणानामभावतः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
अव तत्वतः उस शिला को ओर वसिष्ठजी को जानने की इच्छा से श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : वह शिला कोन है, ओर आप कौन है, कहाँपर स्थित हैँ । यह शिलानामक
किसको आप कहते हैं और क्या आपने वह शिला देखी है ? कृपा करके यह सब यथार्थरूप से मुझसे
कहिये