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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 168, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अबुद्धिपूर्वमेवागो यथा शाखाविचित्रताम् । करोत्येवमजश्चित्राः सर्गाभासः ख एव खम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

एक सौ छासठवाँ सर्गं समाप्त एक सौ सड़सठवाँ सर्ग विभिन्न वादियों की उक्त चार ख्यातियों का तत्त्वज्ञ की दृष्टि से निराकरण और तीनों अवस्थाओं से निर्मुक्त आत्मतत्व का निरूपण करना | श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, तत्त्वज्ञ के प्रति शब्दार्थदष्टिरूप आत्मख्याति, असत्‌ख्याति, अख्याति और अन्यथाख्याति खरगोश के सींगों की तरह असत्‌ हैं