Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 17, Verses 9–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 17, verses 9–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 9-11
संस्कृत श्लोक
शयने कर्दमे शैले गृहे व्योम्नि स्थले जले ।
स्थूला सूक्ष्मा निराकारा रूपान्तरगतापि च ॥ ९ ॥
यत्र तत्र स्थिता सुप्ता प्रबुद्धा भस्मतां गता ।
धृता नीता निमग्ना च दूरस्था निकटा सती ॥ १० ॥
शरीरवटधानान्तःस्थिताहंत्वनवांकुरा ।
शास्त्राजालं तनोत्याशु संसाराख्यमिदं क्षणात् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
शाखासमूह का विस्तार कर देती है