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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verses 1–4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verses 1–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 1-4

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । ब्रह्मन्कोऽस्य सुहृद्ब्रूहि येनासौ रमते सह । रमणं किंस्वभावं स्यादुत रत्यात्म वास्य तत् ॥ १ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । स्वप्रवाहेहितं नाम स्वप्रायेहितनाम च । स्वकर्म नाम चास्यास्ते मित्रमेकमकृत्रिमम् ॥ २ ॥ पितृवद्विहिताश्वासं दारा इव नियन्त्रणम् । संकटेषु दुरन्तेषु नित्यमव्यभिचारि च ॥ ३ ॥ अशङ्कितोपचरणं सुसंपादितनिर्वृति । कोपेष्वकोपनतया वितीर्णावर्जनामृतम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि आपने मन्द अधिकारियों का अज्ञान मुखविकारादि चिहठो से ताड लिया तो अज्ञान की निवृति किन लक्षणो से जानी जा सकती है यों मुक्त के लक्षणों की जिज्ञासा करनेवाले श्रीरामचन्द्र आदि से श्रीवसिष्ठजी मुक्त के लक्षणों का वर्णन करते हैं। जिस नित्य अन्तर्मुख बुद्धिवाले परमात्मा मेँ आसक्त मतिवाले ज्ञानी पुरुष के सुख के साधनभूत विषय सुख के लिए नहीं हैं और दुःखसाधन दुःख के लिए नहीं है, वह मुक्त कहलाता हे । जैसे अज्ञानियों की बुद्धि बिखरे हुए विषयों पर आसक्त होकर उनसे विचलित नहीं होती हे वैसे ही चिदाकाश में अचल (अटल) निष्ठावाले जिस पुरुष की बुद्धि उससे विचलित नहीं होती है वह जीवन्मुक्त कहा जाता है । जिसका निश्चल चित्त चिन्मात्ररूप परमात्मा में विश्रान्त होकर उसी में रति को प्राप्त हो गया वह जीवन्मुक्त कहलाता है । परमात्मा में विश्रान्त हुआ जिसका चित्त उससे हट कर फिर इस दृश्य में रति को प्राप्त नहीं होता वह जीवन्मुक्त कहलाता हे

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ अड़सठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ उनहत्तरवाँ सर्ग विश्रान्त चित्तवाले जीवन्मुक्त के प्रचुर लक्षणों का तथा आत्मवान्‌ की सदा सुप्ति का कथन ।