Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
समदृष्टिरुदारात्मा वदान्यः संविभागवान् ।
पेशलस्निग्धमधुरः सुन्दरः पुण्यकीर्तनः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
अत्यन्त अणुओं में (सूक्ष्मों मैं) सबसे अत्यधिक अणुतम (सूक्ष्मतम)
तथा अत्यन्त स्थूलपदार्थो मेँ सवसे अत्यधिक स्थूलतम“ आत्मा को चिदाकाशरूपी शय्या मेँ स्थिति
(चिदाकाशनिष्ठ) कर आत्मवान् पुरुष सुख से सोता है