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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 171, Verses 3–4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 171, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 171 · श्लोक 3,4

संस्कृत श्लोक

देशाद्देशान्तरप्राप्तौ मध्ये यत्संविदो वपुः । तद्दृश्यमिति भातीदं दृश्यमन्यन्न विद्यते ॥ ३ ॥ महाप्रलयसंपत्तावादिसर्गः पुनः किल । परस्मात्कारणाभावे कुतो दृश्यस्य संभवः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

उस मित्र के गुणों का वर्णन करते हैं। वह पिता के समान ढाढस देनेवाला हे, स्त्री के समान अकार्यों के विषय में लज्जा द्वारा नियन्त्रण करता है और दुर्निवार्य संकटों में सदा साथ रहता है, कभी बिछुड़ता नहीं है । उसके सेवाआदि व्यवहार में किसी प्रकार की शंका का नाम-निशान नहीं है, वह निर्वाणरूप परम सुख का सम्पादन करता है तथा क्रोध के अवसरों में स्वयं कोपरहित होने के कारण शान्ति से समाधानरूपी अमृत का प्रदान करता है