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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verses 37–40

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 173, verses 37–40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 37-40

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

ऐसी स्थिति में फलितार्थ कहते हैं। इस प्रकार कदापि किंचित्‌ भी जगत्‌ का संभव है ही नहीं जगत्‌ मृगतृष्णा के जल की भाँति अज्ञानवश दृष्टिगोचर हुआ है न कि परमार्थरूप से ॥३ ६॥ ऐसी स्थिति में हमारी प्रतिज्ञा की सिद्धि में कौन कसर रही, ऐसा कहते हैं। जब यह अर्थ सिद्ध हुआ तब स्वप्न में और सृष्टि के आदि में परम चिदाकाश का ही भान होता है वही "सर्ग" (सृष्टि) यह दूसरा नाम रखकर आत्मा में स्थित है। अपने स्वरूप से च्युत हुए बिना सद्रूप चिदाकाश ही अपने में अपने से ही जगद्रूपसा स्थित होकर भासित हुआ है। सृष्टि के आदि में स्फुरित हुए परमब्रह्म में मिथ्या स्फुरित होता हुआ सा यह दृश्य स्थित है अतः इसमें कीं पर हेय ओर उपादेय का भास कैसे हो सकता है ? कारण का अभाव होने से यह दृश्य न तो कहीं कुछ आकारवान्‌ (साकार) है और न स्मृतिरूप ही है केवल परमात्मा का स्वरूप ही दृश्यरूप से भासता हे