Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 173, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
यथागेन्द्रे दृषद्वृक्षवार्यादौ स तथाग्रहः ।
तथा सर्वात्मनोऽगेन्द्रपुरतायां तथाग्रहः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा यदि प्रजापति की पूर्वकल्प में की गई
प्रबल उपासना से उत्पन्न हिरण्यगर्भ में अहंभाव विषयक संस्कार के बल से उसी तरह की स्मृति से
उसके देहादि कुछ होगा तो वह केवल उपासनारूप मन की कल्पना से जन्य होने के कारण केवल
मानसिक अपृथ्वी आदि से उत्पन्न अतितुच्छ संकल्पनगर के सदृश मिथ्याभूत ही होगा न कि सत्य
होगा । इस तरह भी हमारे ही सिद्धान्त की सिद्धि है, यह भाव है