Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 173, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
चित एव यथा स्वप्ने भवेत्काष्ठोपलादिता ।
चिदाकाशस्य सर्गादौ तथैवावयवादिता ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि पहले उदाहरण के रूप में प्रदर्शित श्रुति में “दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः“
यों विराटशरीर पृथिवी आदि से रचित ही सुना गया है ओर वह “धाता यथापूर्वमकल्पयत्" इस वचन से
पूर्व कल्प की स्मृतिपूर्वक ही रचा गया है, ऐसा प्रतीत होता है । ऐसी अवस्था में आपका पूर्वोक्त कथन
कैसे घट सकता है ? इस पर कहते हैं।
प्रजापति को आदि सृष्टि में पहले का कोई अनुभव न होने के कारण स्मृति होती ही नहीं है । जो
यह स्मृति श्रुतिवचन बल से प्रतीत होती है उसका श्रुति ने जगत् को सत्य माननेवाले अज्ञानियों की
बुद्धि से अनादि सिद्ध कर्मकाण्ड प्रवाह के प्रवर्तन के लिए परबुद्धि के अनुसार बोधन किया है। तत्त्वज्ञानी
प्रजापति की बुद्धि से तो वह (स्मृति) नहीं है