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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verses 17–18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 174, verses 17–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 17,18

संस्कृत श्लोक

तच्च नोपलवज्जाड्यं न सुषुप्तोपमं भवेत् । न निर्विकल्पं न च वा सविकल्पं न वाऽप्यसत् ॥ १७ ॥ दृश्यात्यन्तासंभवात्म तदेवाद्यं हि वेदनम् । तत्सर्वं तन्न किंचिच्च तद्वदेवाङ्ग वेत्ति तत् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं तरंग नहीं हूँ बल्कि जल ही हूँ, ऐसा युक्तिपूर्वक जिस तरंग ने समझ लिया फिर उसकी तरंगता कैसे रह सकती है ? अचेतन में भी चेतनता के आरोप से यह कथन है, यह समझना चाहिये । चूँकि जल की तरंगता के समान इस परम ब्रह्म की जगत्ता का भान है अतएव तरंगत्व- अतरंगत्व यानी तरंग के सदृश जगत्ता ओर अजगत्ता ब्रह्म की दो शक्तियाँ हैं