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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verses 23–26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 174, verses 23–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 23-26

संस्कृत श्लोक

मोक्षोपायाभिधं शास्त्रमिदं वाचयतानिशम् । बुद्ध्युपायेन शुद्धेन पुंसा नान्येन केनचित् ॥ २३ ॥ न तीर्थेन न दानेन न स्नानेन न विद्यया । न ध्यानेन न योगेन न तपोभिर्न चाध्वरैः ॥ २४ ॥ भ्रान्तिमात्रं किलेदं सदसत्सदिव लक्ष्यते । व्योमैव जगदाकारं स्वप्नोऽनिद्रे चिदम्बरे ॥ २५ ॥ न शाम्यति तपस्तीर्थैर्भ्रान्तिर्नाम कदाचन । तपस्तीर्थादिना स्वर्गाः प्राप्यन्ते न तु मुक्तता ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

चिदाकाश में जो शून्यतारूप चित्‌ के चमत्कार स्फुरित होते हैं वे ही ये सृष्टि, प्रलय और स्थिति के भ्रमज्ञान हैं । चिन्मात्र आकाश का स्वयं ही स्वप्न तुल्य चित्ततारूप जो निर्मल स्फुरण है वही यह पितामह (ब्रह्मा) हे । जैसे समुद्र मेँ तरंग निरन्तर उसी रूप से (अपने पूर्वतनरूप से) अथवा उससे विलक्षणरूप से फुरता है वेसे ही चिदाकाश में आदि और अन्त रहित सृष्टि ओर प्रलय का विभ्रम भी निरन्तर फुरता है । चिदाकाश का मनोहर स्फुरण विराट के नाम से प्रसिद्ध है, उस विराट का मनरूप ब्रह्मा भी जो कुछ भुवन, भूत आदि रचेगा वह भी संकल्पनगरवत्‌ ही काल्पनिक होगा न कि सत्य