Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 174, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 174, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 174 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
दृष्टमप्यस्ति यन्नेशे न चात्मनि विचारितम् ।
अन्यथानुपपत्त्यान्तर्भ्रान्त्यात्म स्वप्नशैलवत् ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
चित् के वितूविरुद्ध अचित्त्त की तरह निरवयव चित् की सावयवता भी स्वप्न के अनुभव के बल से
ही होती है, यह स्वीकार करना चाहिये ऐसा कहते हैं।
जैसे स्वप्न में चित् से ही काष्ठभाव, पाषाण भाव आदि होते हैं वैसे ही सृष्टि के आदिमे चिदाकाश
की अवयव आदि रूपता होती हे