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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 176, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । जगन्ति सन्त्यसंख्यानि भविष्यन्ति गतानि च । तत्कथाभिः कथं ब्रह्मन्प्रबोधयसि मामिमम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

शास्त्र द्वारा अज्ञता के हटने पर वह मुक्त हो जाती है, यह वर्णन । यह सृष्टि और उसकी अस्तिता अभिन्न है इस कथन से सृष्टि चित्‌ की देह ही है ऐसी प्राप्त हुई शंका का निराकरण करते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, आदिम चिदाकाश अपनी अविद्या से स्वप्न तुल्य बनकर जीवरूप से आवागमन के चक्कर में पड़कर “मेँ देवता हूँ, मैं मनुष्य हूँ" इत्यादि तत्‌-तत्‌ देहो में तादात्म्य के अध्यासं का काम, कर्म, वासना आदि द्वारा कारण होता है, किन्तु जीवोपाधि की सिद्धि के पहले महाप्रलय में स्वप्न तुल्यता की प्राप्ति होने पर दृश्यरूप अन्यता का संभव न होने से निमित्त की असिद्धि वश उस चिद्व्योम का दृश्य सृष्टिरूप शरीर किस कारण से होगा ? यह अर्थ है

सर्ग सन्दर्भ

एक सो चौहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पचहत्तरवाँ सर्ग जब तक अज्ञान रहता है तब तक चिति ही बिना किसी कारण के जगत्‌ की तरह प्रतीत होती है ।