Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verses 32–33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 176, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 32

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

परब्रह्म परमात्मा निमेष और उन्मेष- दोनों अवस्थाओं में एकरूप ही रहता ह । अतः चिति से ही दृश्य का "अस्ति" (है) ओर "नास्ति" (नहीं है) यों स्फुरण होने से दृश्य सत्‌-असत्‌ है, किन्तु चिति सदा सत्तैकरूप ही है