Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 176, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 35
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हिन्दी अर्थ
जैसे
आकाश अपने में अध्यस्त नीलरूपता से स्फुरित होता है वैसे ही चिति भी अचित्यात्मकरूप से (अचेतन
दृश्य जगत्रूप से) स्फुरित होती है, इसलिए जो कुछ यह जगत्रूप से भासता है,वह जगत् शरीरधारी
चिन्मात्र ब्रह्म ही है