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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 176, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

यदा विदितवेद्यः संस्त्रिकालामलदर्शनः । भविष्यसि तदा तानि प्रत्यक्षेणैव भोत्स्यसे ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

तो क्या अनुभव भी असत्‌ है ? इस पर नकारात्मक उत्तर देते हैँ । इस तरह जो जगत्‌ के रूप से अवभासित होता है वह जगत्‌-शून्यस्वरूप अत्यन्त निर्मलरूप आदि-अन्तविहीन स्वच्छतम चिद्धातु ही हे