Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 179, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 49
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हिन्दी अर्थ
चिन्मात्रआकाशरूप कुम्हार द्वारा अपने शरीररूपी चंचल (घूम रहे) चाक
में अपने शरीररूपी मिट्टी से इस सृष्टि की रचना निरन्तर क्यों की जाती है । कुतः“ यों असम्भावना
की उक्ति सृष्टि का मिथ्यात्व जताने के लिए है