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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verses 52–53

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 179, verses 52–53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 52,53

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इस कारण भी काष्ठ, लोहा आदि सचेतन हैं, ऐसा कहते हैं। चूँकि वह परम चिद्धाम ही सर्वात्मक संवित्‌-धाम समष्टिव्यष्टि चित्त में मणियों की राशि में मणि की तरह देदीप्यमानरूप से भीतर स्थित होकर किसी तृण, काष्ठ, शैल आदि अर्थ की तरह उदित होता है क्योकि "तदनु प्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत्‌” ऐसी भगवती श्रुती है। इस कारण भी तृण, काष्ठ आदि सचेतन हैं, चूँकि ये (तृण, काष्ठ आदि) कार्यकारणरहित ब्रह्म की सृष्टि हैं। जैसे सूर्य की प्रभा सूर्य की स्वभावभूत ही है अप्रकाशरूप नहीं है, इसलिए ये भी ब्रह्म के स्वभावभूत ही हैं, उससे भिन्‍न नहीं हैं। जब भिन्न नहीं हैं तब यह सब सचेतन ब्रह्मरूप ही है यह निश्चय हुआ