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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

यदि वाप्युदिते वातैस्तत्तदस्या न लक्ष्यते । तदन्तःसंस्थितैः स्पन्दो नावि कोशगतैरिव ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

व्यवहार ष्टि से जगत्‌ और इसकी रान्ति दोनों यदि वायु के भीतर उड़ते हुए ही उदित हैं; तो फिर हम लोग ङस प्रथिवी को निश्चलरूप से कैसे देख रहे हैं ? इस आशंका पर कहते हैं / जगत्‌ और इसकी भ्रान्ति ये दोनों उदित नहीं हैं, यह तो परमार्थ में निश्चित ही है। अथवा व्यवहार दृष्टि से यदि उदित हैं, तो भी वायु द्वारा किये गये इस पृथिवी के तत्‌-तत्‌ भ्रमण, परिवर्तन आदि को इसके भीतर बैठे हुए हम लोग ऐसे नहीं देख रहे हैं, जैसे कि नौका में उत्पन्न हो रहे स्पन्द को उसके भीतर बैठे हुए मनुष्य नहीं देखते