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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

यथा योजनविस्तीर्णं लघौ सद्मानुभूयते । यत्तस्य पादपस्तम्भे परमाणौ यथा जगत् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह पश्येमे पुरः उल्लन्त इव मन्दरमेरवः ' इस अपनी उक्ति का श्रीरामचन्द्रजी से उपपादन करके; उपरुपिर्यन्‍्तरन्‍्त: कदलीदलफीठवत्‌“ इस उक्ति में भी छोटे में बड़े के समावेश को पहले बड़े में अल्पत्व की कल्पना करके दिखलाते हैं / छोटे-से वृक्ष स्तम्भ में विचित्र व्यूहरचनापूर्वक निर्माण करने के लिए प्रयत्नशील शिल्पकार की बुद्धि से अल्पत्व की कल्पना द्वारा जैसे योजनों दूर तक विस्तीर्ण हुआ घर अनुभूत होता है, वैसे ही भीतर-भीतर अत्यन्त सूक्ष्म भी परमाणु में यह संसार बुद्धि से कल्पना द्वारा अनुभूत होता है