Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
संकल्पो वासना जीवस्त्रयोऽर्था लिखिताश्चिता ।
सोनुभूतोऽप्यसत्यः स्यादसत्त्वस्यैव नो सतः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
सत्यस्वरूप यह संसार भला असत्यरूय कैसे होगा ? इस आशंका पर कहते हैं ।
जाग्रत् और स्वप्न के संकल्प, वासनामय सुषुप्ति तथा इन दोनों में प्रतिबिम्बित चिद्रूप भोक्ता
जीव-ये दोनों पदार्थ सत्यकूटस्थ चिति के द्वारा अपने स्वरूप में चित्र की नाई चित्रित हुए हैं,
इसलिए चित्र संसार के सदृश यह संसार अधिष्ठानसत्ता से सत्यस्वरूप अनुभूत होता हुआ भी
असत्यरूप जीव की ही दृष्टि में सत्यरूप हैं, अधिष्ठान सत् की दृष्टि में नहीं, क्योंकि उसके साथ
तो उसका स्पर्श नहीं है। तात्पर्य यह कि जैसे चित्र में प्रतिबिम्बित या स्वप्न में देखे गये घोड़े, चित्र
या स्वप्न के पुरुषों के ही चढ़ने के काम में आते हैं, इन दोनों के बाहर रहनेवाले सत्य पुरुष के चढ़ने
के काम नहीं आते वैसे ही असत्पुरुष के लिए ही यह असद्रूप संसार भी है, सत्पुरुष के लिए नहीं
है