Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
इत्यस्मिन्नखिलपदार्थसार्थकोशे व्योमन्यप्यतिवितते जगन्ति सन्ति ।
अन्योन्यं परिमिलितानि कानिचिच्च नान्योन्यं परिमिलितानि कानिचिच्च ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस वर्णित रीति से अखिल
पदार्थ-समूहों का ज्ञेयभूत अज्ञात प्रत्यगात्मरूप, परमार्थतः सर्वत्र व्याप्त तथा शून्याकाश के सदृश
चिदाकाश में अविद्या द्वारा अनन्त जगत् स्थित हैं । वे कितने तो कुछ जीवों के भोजक अदृष्ट का
साम्य होने पर जाग्रतअवस्था में ब्रह्माण्ड की एकता से परस्पर मिले हुए रहते हैं एवं अदृष्ट का
वैषम्य होने पर तो ब्रह्माण्डभेद और स्वप्नावस्था में परस्पर मिले हुए नहीं भी रहते हैं