Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
पृथक्स्थितानि व्यतिमिश्रितानि जलानि चैवाम्बुनिधौ नदीनाम् ।
तारार्कचन्द्रग्रहमण्डलानां समोदितानां नभसीव भासः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रथकृरूप से स्थित हुए इनके एकत्र मिलकर रहने में तथा एकत्र मिले हुए इनके एथकृरूप से
स्थित रहने में क्रमशः दो दष्टान्त कहते हैं /
जैसे नदीरूपी पात्र में पृथक्रूप से स्थित हुए भी जल सागर में बिलकुल मिले हुए रहते हैं तथा
आकाश में एक ही समय में उदित हुए भी सब तारों के प्रकाश “यह इसका प्रकाश है” इस तरह से
विवेचन करने में अशक्य होने के कारण एक में सर्वथा मिले हुए भी एक के चलने पर दूसरे के न
चलने में पृथक् स्थित हुए रहते हैं, वैसे ही पृथक्-पृथक्रूप से स्थित हुए भी ये सब संसार आत्मा
में एकरूप से स्थित हैं