Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
मृते पुंसि नभोवातैर्मिलन्ति प्राणवायवः ।
सरिज्जलैरिवाम्भोधिजलान्यात्मद्रुतानि हि ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
ठीक है, रहें. किन्तु वे दिशाओं में वायु द्वारा इधर-उधर केसे पहुँचाये जाते हैं ? इस पर
कहते हैं।
पुरुष के मर जाने पर उसके शरीर से उत्क्रान्त हुऐ प्राणवायु बाह्याकाश में पूर्ण पवनों के साथ
ऐसे मिल जाते हैं, जैसे स्वरूपतः द्रुत होने के नदियों के जल समुद्र के साथ मिल जाते हैं