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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 181, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 181 · श्लोक 41

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इसी उपरोक्त कथा का संक्षेप से उपसंहार करते हैं। सप्तद्वीप ओर समुद्रो से व्याप्त दिशाओंवाली समग्र पृथ्वी का उपभोग करने के लिए वृक्ष में शरीर लटका कर ऊपर की ओर पैर कर कठिन तपस्या करने के अनन्तर सूर्यपुरुष से अपना ईच्छित प्राप्त करके, उसी वृक्ष के नीचे तीन दिन विश्राम कर पादपीड़ादि की निवृत्ति हो जाने पर वह ब्राह्मण मुझ मित्र को साथ लेकर अपने भवन मथुरा को जाने के लिये प्रवृत्त हुआ