Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 183, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 183 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
कथं चैतानि तिष्ठन्ति कस्मिंश्चिद्गृहकोशके ।
पद्माक्षकोशके सूक्ष्मे कथं भान्ति मतंगजाः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार जा रहे तुम्हारे बहूओं ओर पुत्रों की तपस्या से उपार्जित प्राप्त
हुए महावर विपरीत (दुःखदायी) हो जायेंगे