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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verses 12–13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 184, verses 12–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

असत्यपि यथा वह्नावुष्णसंविद्धि भासते । संविन्मात्रात्मके व्योम्नि तथार्थः स्वस्वभासकः ॥ १२ ॥ असत्यपि यथा स्तम्भे स्वप्ने खे स्तम्भता विदः । तथेदमस्या नानात्वमनन्यदपि चान्यवत् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

वर ओर शापो का स्वरूप कहते हैं। यहाँ पर वे वर सुन्दर, कमल हाथ में लिये हुए, ब्रह्मदण्डरूपी अस्त्र से विभूषित, चन्द्रमा के समान शुभ्र शरीरवाले और वे चतुर्भुज होंगे