Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 184, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
कदम्बतापस उवाच ।
सर्वं शान्तं चिदाकाशे नानास्तीह न किंचन ।
दृश्यमानमपि स्फारमावर्तात्मा यथाम्भसि ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
एक ही फल वर और शाप दोनों का फल हो यह कठिन ही नहीं असंभव है, ऐसा कहते हैं।
वर और शाप की फलतावाले शुभत्व और अशुभत्व धर्म एक ही धर्मी में स्थिति को, जो संभव नहीं
है, कैसे प्राप्त होते हैं ?
शंका : यद्यपि वे एक धर्मी के आश्रित नहीं हो सकते तथापि परस्पराश्रित तो हो सकते हैं ।
समाधान : आधार ही अपने में आधेयता कैसे कर सकता है ? एक ही का अपने में आधारआधेयभाव
का संभव नहीं है, यह भाव है