Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verses 50–51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 184, verses 50–51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 50,51
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हिन्दी अर्थ
स्वप्न के समान ही यह अविरुद्ध है, यों उत्तर देते है।
ब्रह्माजी ने कहा : हे वरों, चूँकि आप लोग और हम लोग व्यष्टि-समधष्टियों से युक्त व्योमात्मक
सारे जगत् का, जो सच्चितूपरमाणु के अन्दर स्थित है, अन्दर स्वप्नरूप से ही अनुभव करते हैं, अतः
वह परमाणु के भी अन्दर स्थित स्वगृह के भीतर जो स्फुरित होकर समाता है वह क्या आश्चर्य है (क्या
अपूर्व है), प्रकृति के क्रम में कोन विस्मय है ?