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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verses 59–70

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 184, verses 59–70 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 59-70

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अधिपति बनकर सन्तुष्ट होंगे । विशाल बुद्धिवाले वे जिनका पूर्वोक्त वररूप क्रियार्थ पूर्णरूप से विकसित हो चुका था, पूर्वोक्त प्रकार की सप्तद्रीपाधिपतिता को तपस्याओं द्वारा प्राप्त होगे । प्रत्येक चैतन्य के अन्दर दृढ़ निश्चयरूप से जिसका स्फुरण होता है वही बाहर उसके अनुकूल तप, जप आदि कर्मो से किसे प्राप्त नहीं हुआ ?