Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 186, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 186, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 186 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
अयमादिरयं चान्तः सर्गस्येत्यवभासते ।
चितः सुघननिद्रायाः सुषुप्तस्वप्नकोष्ठतः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानमात्र से मोह की निवृत्ति हो जाने से अन्य ज्ञातव्य, द्रष्टव्य और लब्धव्य का भी परिशेष न रह
जाने से अपनी कृतकृत्यता दशति हैं।
ज्ञातव्य जो अमल था उसे मैं जान चुका, अक्षत द्रष्टव्य को मैंने देख लिया, सम्पूर्ण प्राप्तव्य को मैं
प्राप्त कर चुका अब इस ब्रह्मरुप परम पद में विश्रान्त हूँ