Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 186, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 186, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 186 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
स्वयं दृश्यं स्वयं द्रष्टृ स्वयं चित्त्वं स्वयं जडम् ।
स्वयं किंचिन्न किंचिच्च ब्रह्मात्मन्येव संस्थितम् ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
कदम्बतरू तपस्वी ने कहा : मेँ समाधि से विरत होकर एक
क्षण भी नहीं रह सकता । मैं फिर शीघ्र ही त्वरापूर्वक समाधि में ही प्रवेश करता हू