Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
आकल्पाख्यं निमेषं यत्कचनं चैकरूपकम् ।
स्वाभाविकाः स्वभावं तं प्राहुः प्रसृतबुद्धयः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
संवित् का भी जड़स्थावरता में दृष्टान्त देते हैं ।
जैसे चेतन स्वरूपवाला (संवित्मय) जन्तु भी निद्रात्मा होकर जड़ हो जाता है उसी प्रकार यह
स्थावरनामिका संवित् भी जड़ हो जाती है