Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
पदार्थजातं त्वेतावन्न जातं न च दृश्यते ।
ज्ञस्याजातमिदं भाति खमात्मा स्वप्नदृश्यवत् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि चिद्घन निद्रारूप अविद्या विभागहीन है तथापि वह सुषुप्तिरूप आवरण से
वास्तविक स्वरूपभूत भी मोक्ष नाम से प्रसिद्ध भाग को चुरा लेती है, यानी उसके अस्तित्व का अपलाप
कर देती है इतना ही नहीं करती प्रत्युत चित्त बनकर वह इस जाग्रद्भाग और स्वप्न को दिखलाती
है