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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 4–5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verses 4–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 4,5

संस्कृत श्लोक

सर्वशक्तेर्यथा यद्यद्भाति तत्तत्तथैव सत् । संविन्सारतया यायात्कथं भातमभातताम् ॥ ४ ॥ यथा स्थितं यथा भाति चित्त्वाद्ब्रह्म चिराय यत् । तस्य भानमभानाभं नियत्यभिधमेव तत् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

शबलब्रह्मनिष्कर्ष-दृष्टि से इसने जो यह वर्णन किया है वह भी उचित ही है, ऐसा कहते हैं। जो जैसे जिसके द्वारा जिस अधिकरण में जिस प्रकार का जब तक जिस काल में जिससे होता है वह वैसे उसके द्वारा उस अधिकरण में उस प्रकार का तब तक उस काल में शिव, शान्त, जन्मादिरहति, मौन, अमौन, अजर, सर्वव्याप्त, सुशून्य, अशून्य, आदि-अन्तशून्य, अक्षय ब्रह्म ही है