Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
तस्मादुदेष्यत्यखिला जगच्छ्रीः शब्दतत्त्वतः ।
शब्दौघनिर्मितार्थौघपरिणामविसारिणी ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
विधाता की आत्मचिति में समुद्र मेँ जलराशि की तरह जगद्भावों का
अकस्मात् भान होता है जो चिदात्मस्वरूप ही हँ । उन भानो का "सोऽकामयत', "तदैक्षत,
"समक्लृपतां द्यावापृथिवी" इत्यादि श्रुतिर्यो ओर मनीषी ऋषि लोग संकल्प आदि नाम कहते हैं