Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 8–9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 8,9
संस्कृत श्लोक
यथा शून्यत्वमाकाशे कर्पूरे सौरभं यथा ।
यथौष्ण्यमातपे नान्यज्जाग्रदादि तथा चिति ॥ ८ ॥
सर्गप्रलयनाम्न्येकप्रवाहानन्यसत्तया ।
चिन्मात्रगगनात्मैकब्रह्मात्मन्येव संस्थितम् ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत के ही ब्रह्म होने का फल कहते हैं।
इसलिए यह समस्त जगत् चिदाकाश, आदिमध्यरहित, अखण्ड, सोम्य और मोक्षरूप है। अतः
जिसका शरीरादिवैचित्रयरूप बन्धन अस्त हो चुका है ऐसे तुम निरामय आत्मस्वरूप ब्रह्म ही होकर
स्थित रहो | व्यवहार में तो ब्रह्म स्वयं दृश्य है, स्वयं द्रष्टा हे, स्वयं चेतन है, स्वयं जड है, स्वयं सब
कुछ है और स्वयं कुछ नहीं भी है, वास्तव में तो वह अद्वितीय स्वप्रकाशानन्द एकरस आत्मा में ही
स्थित है