Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 39
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हिन्दी अर्थ
उसके बाद जो होता है, उसे कहते है ।
घनसंवेदन के बाद जीव नामवाली वह आत्मकल्पना जीवादि रूपों को प्राप्त होती हुई अधिकारी
शरीर की प्राप्ति होने पर फिर परमपद (ब्रह्म) हो जाती हे