Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verses 41–42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verses 41–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 41,42
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हिन्दी अर्थ
उस समय जब कि उसकी अविद्या से आवृत अवस्था रहती है, वह एकमात्र आत्मतादात्म्यअध्यास
की भावनारूप सारवाले देह, इन्द्रिय आदि से संसारोन्मुखी होकर निज स्वरूप के विरह से उत्पन्न हुई
ग्लानि से होनेवाली विविध चेष्टाएँ करती है । अद्वितीय तथा अन्य वस्तुओं से शून्यस्वरूपवाली ही वह
स्वसत्ता सविकल्प चित् की भावना की भ्रान्ति से शब्द आदि गुणों से पूर्ण गर्भवाली होकर होनेवाले
आकाश आदि पंचभूतों की प्रवृत्तिनिमित्तभूत सूक्ष्मभूतात्मिका हो गई