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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 189, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 189, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 189 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । इत्यातिवाहिकालोकः स तस्याद्यप्रजापतेः । कठिनत्वं कथं यातः कथं स्वप्नस्य सत्यता ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जीवन से यानी मुख्य प्राण और कर्मेन्द्रियों के धारण से तथा चेतन से यानी ज्ञानेन्द्रियो के धारण से वह जीव कहलाता है, पहले अनुभव में आये हुए अतीत (भूत) ओर अनागत (भावी) चेत्यो की ओर प्रवण होने से वह चित्त कहलाता है एवं निकटवर्ती चेत्यो की ओर प्रवण होने के कारण वह चित्‌ कहलाता है